समावर्तन संस्कार, दीक्षांत समारोह

आज हम जानेंगे आचार्य आनन्द प्रकाश नौटियाल जी से  समावर्तन संस्कार के बारे में क्या है मतलब और महत्व
गुरुकुल से गृहस्त आश्रम की तरफ जाना।

गुरुकुल  से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चार के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी उस मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे उसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे 'विद्या स्नातक' (B.A) या उसके समकक्ष की उपाधि  आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

इस संस्कार के माध्यम से गुरु, शिष्य को इंद्रिय निग्रह, दान, दया और मानवकल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद में लिखा है -
युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यों  मनसा देवयन्तः।।
अर्थात् युवा पुरुष उत्तम वस्त्रों को धारण किए हुए  उपवीत (ब्रह्मचारी) सब विद्या से प्रकाशित जब गृहाश्रम में आता है, तब वह प्रसिद्ध होकर श्रेय मंगलकारी शोभायुक्त होता है। उसको धीर, बुद्धिमान, विद्धान, अच्छे ध्यानयुक्त मन से विद्या के प्रकाश की कामना करते हुए, ऊंचे पद पर बैठाते हैं।

गुरुकुल में आचार्य किस प्रकार स्नातक को भावी जीवन का उपदेश करते थे।

सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् ।

सत्य बोलना। धर्म के मार्ग पर चलना। स्वाध्याय करने में आलस्य मत करना  

(लिखना पढ़ना समाप्त हुआ अब हमको पठन-पाठन से क्या काम, ऐसा मत समझना)

आचार्य को उनकी प्रिय वस्तु देना और सन्तान रूपी तन्तु का विच्छेद मत करना 
(अर्थात सन्तान पैदा करने से मत चूकना) 

सत्य को जानने और बोलने के प्रति प्रमाद (उपेक्षा) मत करना। धर्म कर्तव्य के मार्ग पर चलने से प्रमाद न करना। कल्याणकारी कार्यों को करने से प्रमाद मत करना। संसाधनों के विकास में प्रमाद न करें।

स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि । ये केचास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वया आसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया अदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।

स्वाध्याय और प्रवचन में प्रमाद न करें। देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । माता को देवता मानना। पिता को देवता मानना। आचार्य को देवता मानना। जो अनिन्द्य कर्म हैं (जिन कर्मों का कथन किया जा सके) उन्हीं का सेवन करें, अन्य नहीं। हमारे (आचार्यों के) जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों, केवल उन्हीं की उपासना करना दूसरे कर्मों का नहीं (संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है आचार्य ने ऐसा किया है' उसका अनुकरण नहीं करना। जो हमसे अच्छे काम बन पड़े है उन्हीं का अनुकरण करना, हमारे अनुचित कामों का अनुकरण मत करना)। हमसे जो अधिक श्रेष्ठ सच्चरित्र ब्रह्मज्ञानी (विद्वान) मिलें उनकी उपासना करना (अन्धश्रद्धा मत करना अपनी बुद्धि पर भरोसा करके विवेक से काम करना)। श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिये। बिना श्रद्धा के दान नहीं करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दान देना चाहिये । विनम्रतापूर्वक  दान देना चाहिये । इस भय से दान देना चाहिये कि दान नही करूँगा तो भगवान को क्या मुँह दिखाऊँगा। 
(ज्ञानपूर्वक , विधिपूर्वक , आदर एवं उदारतापूर्वक निस्वार्थ भाव से) दान देना चाहिये (प्रमाद से , उपेक्षापूर्वक नही) श्रद्धा और भक्ति के साथ गुरुदेव भगवान के सम्मुख यह वचन देना चाहिए की अपनी पूर्ण श्रद्धा से अपने नियम कर्म का मैं पूर्ण पालन करूंगा

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