(मंत्र सिद्धि ध्यान योग पूजन के लिय सर्वोत्तम आसन)mantra siddhi meditation yoga worship best seat for

सनातन धर्म में ध्यान योग पूजन हेतु बताया गया है सबसे सर्वोत्तम आसन किस प्रकार होना चाहिए कैसा होना चाहिए आइए आज हम जानेंगे 
आध्यात्मिक गुरु आचार्य आनन्द प्रकाश जी से आसन का महत्त्व 
पूजा को सफल बनाने के लिए आसन से जुड़ी ये बातें ध्यान रखना जरूरी

हम सभी सनातन धर्मी अपने घर में पूजा पाठ हमेशा किसी आसन पर बैठकर करते हैं लेकिन आसन के कुछ विशेष नियम होते है, जिनके बारे में हर किसी को जानकारी नहीं होती ऐसे में भी आसन किसी भी पूजा में इस्तेमाल कर लेते हैं लेकिन वास्तव में पूजा के लिए कुछ खास आसनों को उत्तम माना गया है साथ ही अलग अलग भगवान की पूजा में भी विभिन्न आसनों के प्रयोग की बात शास्त्रों में कही गई है।

आइए जानते हैं आसन के पीछे का महत्वपूर्ण राज

आसन बिछाना क्यों जरूरी है, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है धरती की चुम्बकीय शक्ति यानी गुरुत्वाकर्षण शक्ति जब कोई साधक ध्यानमग्न होकर विशेष मंत्र का जाप करता है तो उसके अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।
अगर उत्तम आसन  न बिछाया जाए तो ये ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण शक्ति की वजह से धरती में समाहित हो जाती है और आपको इसका कोई लाभ नहीं मिल पाता इसलिए पूजा के दौरान आसन बिछाना जरूरी माना गया है। लेकिन आसन ऐसा होना चाहिए जो ऊर्जा आपको मिलनी चाहिए वो व्यर्थ न हो।


ये आसन नही माने गए उत्तम 👇

अब सवाल उठता है कि आखिर कैसा आसन पूजा के लिए उपर्युक्त है क्योंकि आजकल जैसे चटाई, दरी, पटरी आदि के बहुत सारे आसन बाजार में बिकते हैं. लेकिन इन्हें शास्त्र सम्मत नहीं माना गया है
ब्रह्म पुराण में आसन के संदर्भ में कहा गया है

वंसासने तु दरिद्राम पाषाने व्याधि सम्भव 
धरण्याम दुख संभूति दौरभाग्यम छिद्र दारूजे
त्रने धन हानि यशो हानि पल्लव चित्त विभ्रम 

यानी बांस से दरिद्रता, पत्थर से रोग, पृथ्वी पर दुख, लकड़ी से दुर्भाग्य, तिनके पर धन और यश हानि और पत्तों पर पूजा करने से मन भ्रमित हो जाता है इसलिए पूजा के लिय उत्तम आसन होना आवश्यक है

सर्वोत्तम आसन कैसा होना चाहिए

कौशेय कंबलम चैव अजिनम पट्ट मेव च 
दरूजम तलपत्रम वा आसनम परिकल्प येत, 

कुश आसन- जो साधक कुश आसन पर बैठकर मंत्र-जप की साधना करता है, उसे शुचिता, तन्मयता और स्वास्थ्य में सदैव वृद्धि होती है। उसे अनंत फल प्राप्ति सदैव होती है। विशेष फलदायक और पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति होती है।

मृगचर्म आसन- जो साधक इस आसन पर बैठकर साधना करता है, उन्हें मोक्ष तथा धन की प्राप्ति होती है। 


कम्बल आसन- कर्म सिद्धि की पूर्ण लालसा के लिए किए जाने वाले जप में कम्बल आसन सर्वोच्च लाभप्रद सिद्धदायक होता है।

व्याघ्रचर्म आसन- यह रजोगुणी आसन है, जिसे राजसिक वृत्ति वाले साधकों द्वारा राजसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया जाता है। इस आसन पर बैठकर जो साधना करता है, उसे विषैले जन्तुओं का कोई भय नहीं रहता। र्निवघ्न साधना के लिए यह आसन विशेष लाभकारी एवं उपयोगी है।
आसान पवित्र करने का मंत्र विनियोग
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषि : सुतलं छन्द : कूर्मो देवता आसने विनियोग : ।

( निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर आसन पर जल छिडकें ) ।

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥

तदनतर आसन लगाने के बाद आप अपने इष्ट कुलदेवता का ध्यान पूजन कर सकते हैं जब तक आसन की शुद्धि नहीं होगी तब तक किसी भी पूजा का फल आपको प्राप्त नहीं होगा इसीलिए कहा भी जाता है 

प्रथम आसन शुद्ध द्वितीय अर्चन वंदन 

सर्वप्रथम आसन की शुद्धि होनी चाहिए तभी मंत्रों में शुद्धता आती है और सिद्धि प्राप्त होती है 

दूसरे का आसन प्रयोग न करें

आसन के नियमों के अनुसार ये हमेशा आपका व्यक्तिगत होना चाहिए कभी किसी दूसरे का आसन न तो प्रयोग में लेना चाहिए और न ही अपना आसन उसे प्रयोग के लिए देना चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की चित्तवृत्ति भिन्न होती है और आसन पर चित्तवृत्ति का प्रभाव शेष रहता है दूसरे का आसन प्रयोग करने से उसकी चित्तवृत्ति का असर आप पर भी पड़ेगा इसलिए बाहर जाने पर भी यदि संभव हो तो अपना ही आसन साथ लेकर जाएं

रंगों का भी महत्व
अगर आप नियमित पूजा के लिए लाल, पीला, सफेद आसन प्रयोग करें  

लेकिन अगर कोई विशेष साधना करनी है तब आसन के रंगों का चुनाव उसी अनुरूप करना चाहिए 

सुख शांति, ज्ञान प्राप्ति, विद्या प्राप्ति और ध्यान साधना के लिए पीला आसन श्रेष्ठ माना गया है 

वहीं शक्ति प्राप्ति, ऊर्जा, बल बढ़ाने के लिए मंत्रों को जपते समय लाल रंग के आसन का प्रयोग करें

महाकाली, भैरव की पूजा साधना में काले रंग के आसन का प्रयोग किया जाता है 
शत्रु नाश के लिए की जाने वाली साधना में भी काले आसन और लाल आसन का प्रयोग मंत्र के अनुसार प्रयोग में लिया जाता है 
वर्तमान समय में कुश आसन मिलना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, ऐसे में सामान्य पूजा के लिए कंबल आसन सर्वोत्तम है

अपना आसन छोड़कर उठना भी गलत है
पूजा के बाद आसन को यूं ही छोड़कर उठना भी गलत माना गया है उठने से पहले धरती पर दो बूंद जल डालें इसके बाद धरती को प्रणाम करें फिर जल को मस्तक से लगाएं 
तथा इस मंत्र को बोलकर मस्तक पर जल लगाएं
 ॐ शकराय नमः 
इसके बाद आसन को उठाकर यथा स्थान रखें ऐसा करने से आपको अपनी साधना का पूर्ण फल मिलेगा
क्योंकि कहा जाता है कि जब भी कोई साधक तपस्वी महात्मा संत ब्राह्मण कोई योगी अपनी लगन शीलता से ध्यान मग्न होकर भगवान का स्मरण करता है तो इंद्रदेव जी उसकी साधना में ठीक उसके पीठ के पीछे खड़े हो जाते हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि इस तपस्या का फल इस व्यक्ति को इस योगी को प्राप्त हो उन्हें सदैव अपने आसन का डर रहता है कहीं यह साधक तपस्या करने पर भगवान से मिले आशीर्वाद में मेरे आसन को न छीन ले तभी कहा गया है कि अपने आसन से उठने से पूर्व दो बूंद पृथ्वी पर जल गिराकर ॐ शकराय नमः बोलकर माथे पर जल को लगाएं तब अपना आसन वहां से उठाना चाहिए जिससे कि पूर्ण जप तप का फल आपको प्राप्त हो
सत्य सनातन धर्म की जय हो, सत गुरुदेव भगवान की जय हो ,धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो,
 गौ माता की सेवा हो,गंगा मैया की जय हो ,

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अन्नप्राशन संस्कार- शिशु को पहली बार अन्न कब और कैसे ग्रहण कराए ?Annaprasan Sanskar Sanatan Dharma Culture

नामकरण संस्कार, क्यों है जरूरी क्या है महत्व

मनुष्य जीवन का अन्त अंतिम संस्कार