केशान्त संस्कार Keshant Sanskar

सोलह संस्कारों के अंतर्गत आने वाला केशान्त संस्कार क्यों है जरूरी क्या है महत्व  

इस संस्कार को इसलिए किया जाता है जिससे बालक वेदारम्भ का अधिकारी बन सके। 

केशान्त का अर्थ है बालों का अंत करना 
शिक्षा प्राप्ति से पहले यह संस्कार करना प्राचीन काल में बेहद जरूरी होता था। वहीं, प्राचीन काल में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी यह संस्कार किया जाता था।

वेदारम्भ संस्कार में ब्रह्मचारी, गुरुकुल में वेदों का स्वाध्याय तथा अध्ययन करता है। प्राचीन काल में ब्रह्मचारी, ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करता है तथा उसके लिए केश और दाढ़ी और दंड धारण करने का विधान था। जब विद्याध्ययन पूर्ण हो जाता है तब गुरुकुल में ही केशान्त संस्कार सम्पन्न होता है। इस संस्कार में भी आरम्भ में सभी संस्कारों की तरह गणेशादि देवों का पूजन किया जाता था। साथ ही यज्ञ भी किया जाता था। उसके बाद दाढ़ी बनाने की क्रिया सम्पन्न की जाती थी। इसी के चलते इसे श्मश्रु संस्कार भी कहते हैं।
द केशानाम् अन्तः समीपस्थितः श्मश्रुभाग इति ने व्युत्पत्त्या केशान्तशब्देन श्मश्रूणामभिधानात् श्मश्रुसंस्कार॥ 
एव केशान्तशब्देन प्रतिपाद्यते। अत एवाश्वलायनेनापि श्मश्रूणीहोन्दति इति श्मश्रूणां संस्कार एवात्रोपदिष्टः।

पूर्वोक्त विवरण में यह स्पष्ट किया गया है कि केशान्त शब्द से श्मश्रु (दाढ़ी) का ही ग्रहण होता है। अतः श्मश्रु-संस्कार ही केशान्त संस्कार है। इसे गोदान संस्कार भी कहा जाता है। क्योंकि गौ या केश (बालों) को भी कहते हैं और केशों का अन्त भाग अर्थात् समीप स्थित श्मश्रु भाग ही कहलाता है।

गावो लोमानि केशा दीयन्ते खण्ड्यन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या गोदानं नाम ब्राह्मणादीनां षोडशादिषु वर्षेषु कर्तव्यं केशान्ताख्यकोच्यते।

गौ अर्थात् लोम-केश जिसमें काट दिए जाते हैं। इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'गोदान' पद यहां ब्राह्मण आदि वर्णों के सोलहवें वर्ष में करने योग्य केशान्त नामक कर्मका वाचक है। यह संस्कार केवल उत्तरायण में किया जाता है। तथा प्रायः षोडशवर्ष यानी 16वें वर्ष में होता है।

कब किया जाता है केशांत संस्कार

केशांत संस्कार में एक किशोर हो चुके युवा के बाल काटे जाते हैं जिसमे उसकी प्रथम बार दाढ़ी भी बनायी जाती है अर्थात दाढ़ी के बाल काटे जाते है। इसमें दाढ़ी के बाल काटने के साथ ही सिर के बाल भी काट दिए जाते है।

केशांत संस्कार एक युवा के वेदारंभ संस्कार की समाप्ति के पश्चात भी किया जाता है क्योंकि उसके पश्चात उसे गुरुकुल से अपने घर तथा समाज में पुनः लौटना होता है। इसलिये इस संस्कार को करने के पश्चात उसे स्नान करवा कर गुरु के द्वारा स्नातक की उपाधि प्रदान कर दी जाती है जिसके पश्चात वह अपने घर चला जाता है।

यह संस्कार इस पर निर्भर किया जाता है कि कोई जातक वेदाध्ययन कब पूरा करता है। 
इस संस्कार के साथ जातक को ब्रह्मचर्य अवस्था से गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया जाता है। 

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