वेदारंभ संस्कार, Vedarambh, Vidya Aarambh Sanskar
वेदारंभ संस्कार
Vedarambh Vidya Aarambh Sanskar
सत्य सनातन धर्म की जय हो आज हम जानेंगे आध्यात्मिक गुरु आचार्य आनन्द प्रकाश नौटियाल जी से सनातन धर्म संस्कृति के अंतर्गत 16 संस्कारों में से आने वाले विद्यारंभ संस्कार के बारे में।
यह संस्कार जीवन की प्रगति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है इस संस्कार के होने से मनुष्य कभी भी कुसंगति का मार्ग नहीं पकड़ता सदैव धर्म के मार्ग पर चलता है यही सनातन संस्कृति की पहचान है वेद और पुराणों में छुपा है सनातन धर्म संस्कृति का अद्भुत रहस्य
वेदारंभ संस्कार हिन्दू धर्म में ज्ञाना प्राप्त करने से सम्बन्धित है यह संस्कार।
श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्टि।।
संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः।।
भावार्थ:
विद्या वास्तव में कामधेनु है, क्योंकि यह धन का पोषण करती है, विपत्ति (परेशानी) को रोकती है, प्रसिद्धि लाती है गंदगी (गरीबी) को धोती है, दूसरों को संस्कार रूप से पवित्र करती है।
वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं मर्यादित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेद पुराणों का अध्यन कराते थे। अमर्यादित जीवन जीने वाले वेद पुराणों के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, श्यामवेद, अथर्ववेद,
वेदारंभ संस्कार को वास्तव में विद्यारंभ संस्कार माना जाना चाहिये क्योंकि विद्या प्राप्ति के पश्चात ही व्यक्ति वेदों अथवा अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन करने में सक्षम हो पाता था। तब शिक्षा का महत्त्व वेदाध्ययन की दृष्टि से अधिक था। इस कारण इस संस्कार को विद्यारंभ संस्कार अथवा वेदारंभ संस्कार के रूप में जाना जाता है। वेदों तथा अन्य धर्मग्रंथों के अध्ययन से हमें इनके बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त होती थी। इस दृष्टि से इसे वेदारंभ संस्कार के नाम से ही अधिक जाना गया है। वेदाध्ययन के महत्त्व को इस प्रकार से व्यक्त किया गया है
गुरु से प्राप्त विद्या को सबसे बड़ा धन माना गया है। मानव को सभी जीव जन्तुओ में सर्वोत्तम माना गया है क्योंकि मानव ने अपने विद्या और बुद्धि के बल पर प्रकृति को अपने वश में कर रखा है। विद्या का ही परिणाम है कि हम अपने विवेक का प्रयोग कर आसानी से जीवन निर्वहन कर पा रहे हैं।
विद्यया लुप्यते पापं विद्यायाऽयुः प्रवर्धते।
विद्याया सर्वसिद्धिः स्याद्विद्ययाऽमृतमश्रुते।।
अर्थात- वेद विद्या के अध्ययन से सारे पापों का लोप होता है अर्थात् समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं, आयु की वृद्धि होती है, समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं, यहां तक कि उसके समक्ष अमृत-रस अक्षनपान के रूप में उपलब्ध हो जाता है।
हर मां पिता का ये कर्तव्य है कि वो अपने बच्चो को वेदारंभ की शिक्षा दे जो मां पिता ऐसा नहीं करते शास्त्रों में उसे शत्रु के समान माना गया
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
भावार्थ:
जो अपने बच्चे को शिक्षा नहीं देता, ऐसी माँ शत्रु के समान होती है और उसका पिता शत्रुतापूर्ण होता है; क्योंकि हंसों के बीच बगुले की तरह ऐसा आदमी विद्वानों की सभा को शोभा नहीं देता!
इसी लिय कहा गया है
नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत्।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम्।।
भावार्थ: विद्या जैसा कोई मित्र नहीं है, विद्या जैसा कोई साथी नहीं है, विद्या के समान कोई धन या सुख नहीं है।
अनेक विद्वान वेदारंभ संस्कार को अक्षरज्ञान संस्कार के साथ जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार अक्षरों का ज्ञान प्राप्त किये बिना न तो वेदों का अध्ययन किया जा सकता है और न शास्त्रों का लेखन कार्य संभव है। इसलिये वे वेदारंभ संस्कार से पूर्व अक्षरारंभ संस्कार पर बल देते हैं। इस बारे में अनेक विद्वानों का विचार है कि प्रारंभ में तो व्यक्ति को अक्षर (लिपि) का ज्ञान नहीं था। इसलिये तब गुरुमुख द्वारा ही वेदों का अध्ययन किया जाता था। इसके पश्चात धीरे-धीरे व्यक्ति ने लिपि का ज्ञान प्राप्त करना प्रारंभ किया और कालांतर में इसमें विकास होता चला गया। विद्वानों के मतानुसार भगवान बुद्ध के समय में अनेक लिपियां प्रचलित थीं और मनुष्य को लिपि का अच्छा ज्ञान प्राप्त था।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में लिखे अक्षरों को श्रेष्ठ माना है।
ऐसा माना जाता है कि वेदों का सारभूत एकाक्षर ऊँ प्रथम अक्षर था जिससे सबसे पहले मनुष्य का परिचय हुआ। ऊँ अक्षर मंत्र न होकर इसमें बहुत अधिक व्यापकता का संचार दिखाई देता है। ऊँ का उच्चारण मात्र करने से ध्वनियों में स्पंदन का अनुभव होता है। महाभारत के लेखन का काम प्रथम देव श्रीगणेश द्वारा संपूर्ण हुआ था। तांत्रिकों द्वारा अक्षरों की पूजा की जाती है। इसलिये विद्याध्ययन के लिये अक्षर का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है
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