जातकर्म संस्कार कैसे करते हैं
सनातन धर्म के अनुसार षोडश संस्कारों के अंतर्गत चतुर्थ संस्कार को जातकर्म संस्कार कहते है आध्यात्मिक गुरु आचार्य आनन्द प्रकाश नौटियाल जी के अनुसार
जातकर्म संस्कार का महत्व क्या है और इसे कैसे किया जाता है।
जातकर्म संस्कार बालक के जन्म होते ही किया जाता है। इस संस्कार के कृत्य नाल-छेदन के पूर्व ही हो जाने चाहिए, क्योंकि नाल-छेदन के पश्चात् आशौच लग जाता है
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते।
मन्त्रत: प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम्।।
नवजात शिशु के जन्म पर जातकर्म संस्कार किया जाता है
जन्म पर जो भी कर्म संपन्न किए जाते हैं उसे जातकर्म कहते हैं।
जाते जातक्रिया भवेत्।
इसमें शिशु को स्नान कराना, इसमें सोने की शलाका से विषम मात्रा में मधु या घी चटाना, स्तनपान कराना, आयुप्यकरण आदि कर्म शामिल हैं। मान्यता है कि इस संस्कार से बालक मेधावी और बलशाली बनता है। इससे माता के गर्भ में रस पान संबंधी दोष, सुवर्ण वातदोष, मूत्र दोष, रक्त दोष आदि दूर हो जाते हैं।
इस तरह करें जातकर्म संस्कार
जातकर्म संस्कार में सबसे पहले सोने की श्लाका ली जाती है और उससे विषम मात्रा में घी और शहद को विषम मात्रा में मिलाकर नवजात शिशु को चटाया जाता है। क्योंकि यह शिशु के लिए औषधि का काम करती है। इसके बाद माता अपने शिशु को स्तनपान कराती है।
आचार्य आनन्द के अनुसार
उसी समय शिशु के पिता को अपने बड़े-बुजुर्गों और अपने कुल इष्ट देवता का आशीर्वाद भी लेना चाहिए। इसके बाद ही वो अपने शिशु का मुख देखे तो उत्तम होता है। इसके बाद शिशु का पिता किसी नदी या तालाब में या फिर किसी पवित्र धार्मिक स्थल पर स्नान करें। स्नान के समय शिशु के पिता का मुंह उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए
मूल-ज्येष्ठा आदि अनिष्ट काल में शिशु उत्पन्न हुआ हो तो पिता को शिशु का मुख देखे बिना स्नान कर लेंना चाहिए
मान्यता तो यह भी है कि जब शिशु का जन्म होता है तब उसके शरीर पर मसूर या मूंग के बारीक आटे से बनी उबटन लगाई जाती है। इसके बाद ही शिशु को स्नाना कराया जाता है। शिशु का जातकर्म संस्कार करने से उसकी बुद्धि, स्मृति, आयु, नेत्रों की रोशनी तथा सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ एवं सुंदर रहता है या फिर यूं भी कहा जा सकता है कि उसे पूरा पोषण मिल जाता है।
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