कर्णभेध संस्कार ,ear piercing
हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का विशेष महत्व है। इस कड़ी में कर्णभेध संस्कार का महत्व और विधान ।
यह इसलिए किया जाता है, ताकि बच्चे की सुनने की क्षमता का विकास हो सके और वह स्वस्थ भी रहे। कर्णवेध संस्कार के तहत कान में जो आभूषण धारण कराए जाते हैं, उससे बच्चे की सुदंरता भी बढ़ती है। इस प्रक्रिया में लड़के के दाएं और लड़की के बाएं कान को पहले छेदने की परंपरा है।
आइए जानते है आचार्य आनन्द प्रकाश नौटियाल जी से क्यो किया जाता है कर्णभेद संस्कार और क्या है इसका महत्व
कर्णवेध संस्कार बच्चे के सौंदर्य से लेकर उसकी बुद्धि और सेहत तक के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
कान छिदवाने से मेधा शक्ति बेहतर होती है तभी तो पुराने समय में गुरुकुल जाने से पहले कान छिदवाने की परंपरा थी।
ज्यौतिष शास्त्र के अनुसार कान छिदवाने से राहु और केतु के बुरे प्रभाव का असर खत्म होता है। जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों का कारण राहु और केतु ही होते हैं अत: कान छिदवाना जरूरी है।
कर्णभेध संस्कार को करने के लिय उचित दिन समय माह,नक्षत्र, वार, इस प्रकार से है।
वैसे, कार्तिक, पौष, फाल्गुन और चैत्र माह इस संस्कार को करने के लिय उचित महीने है।
नक्षत्र इस संस्कार के लिए मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, श्रवण, घनिष्ठा और पुनर्वसु अति शुभ माने जाते हैं। इन नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में आप यह संस्कार कर सकते हैं।
वार कर्ण वेधन के दिन सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार में से कोई वार होना चाहिए।
तिथि कर्ण वेध संस्कार के लिए चतुर्थ, नवम एवं चतुर्दशी तिथियों एवं अमावस्या तिथि को छोड़कर सभी तिथि शुभ मानी गयी है।
लग्न वैसे तो सभी लग्न जिसके केन्द्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) एवं त्रिकोण (पंचम, नवम) भाव में शुभ ग्रह हों तथा (तृतीय, षष्टम, एकादश) भाव में पापी ग्रह हों तो वह लग्न उत्तम कहा जाता है। यहां वृष, तुला, धनु व मीन को विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
यदि देवगुरु बृहस्पति लग्न में हो तो यह सर्वोत्तम स्थिति कही जाती है।
यह संस्कार इसलिए किया जाता है, क्योंकि इससे बच्चे की सुनने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है।
इस संस्कार के बाद जब बच्चा अपने कानों में कुंडल पहनाता है, तो इससे उसकी सुंदरता देखते ही बनती है। साथ ही उसका तेज भी नजर आता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस संस्कार को करने से बच्चे का हार्निया जैसी गंभीर बीमारी से तो बचाव होता ही है, साथ ही उसके लकवा की चपेट में आने की भी आशंका खत्म हो जाती है।
बताया जाता है कि प्राचीन समय में जो हिंदू कर्णवेध संस्कार नहीं करवाते थे, उन्हें श्राद्ध करने का अधिकार नहीं मिलता था।
इस संस्कार को करने के कई वक्त बताए गये हैं। एक तो इसे बच्चे के जन्म के बारहवें या सोलहवें दिन किया जाता है। इसे बच्चे के जन्म के छठे, सातवें या आठवें महीने में भी किया जा सकता है। वैसे यह भी माना जाता है कि यदि इस संस्कार को बच्चे के जन्म के एक साल तक नहीं किया जाता है, तो इसे फिर विषम वर्ष यानी कि तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष में करना चाहिए।
किसी भी पवित्र स्थान पर यह संस्कार किया जा सकता है। इसमें देवी-देवताओं को पहले पूजन किया जाता है। उसके बाद सूर्य की ओर मुंह करके बैठ जाते हैं। इस दौरान हाथों में चांदी, सोने या लोहे की सुई होती है। इसके बाद बच्चे की कान में इस मंत्र को बोला जाता है
भद्रं कर्णेभिः क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।
फिर लड़के के पहले दाएं और और फिर बाएं कान में छेद करके कुंडल पहना दिया जाता है। यदि लड़की हो तो पहले बाएं और फिर दाएं कान में छेद करके आभूषण पहनाया जाता है। माना जाता है कि इस दौरान सोने का कुंडल या आभूषण पहनना अधिक उचित होता है, क्योंकि इससे दिमाग के दोनों हिस्से विद्युत के प्रभाव से बेहद मजबूत बन जाते हैं। जो लड़कियां अपने कानों में सोने के आभूषण पहनती हैं, उन्हें मासिक धर्म से संबंधित किसी भी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती है। यही नहीं, इससे हरनिया नामक बीमारी से भी छुटकारा मिलता है।
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