विद्या आरम्भ संस्कार Vidya aramba sanskar

सनातन धर्म संस्कृति परम्परा के अंतर्गत षोडश संस्कारों में से विद्यारंभ संस्कार का होना अति आवश्यक है 
उसका महत्व क्या है जानते है आचार्य आनन्द प्रकाश नौटियाल जी से
हर मां पिता का यह कर्तव्य  है कि बच्चे को जन्म देने के साथ-साथ उसकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करे। शिक्षा चाहे वह लड़की हो या लड़का, अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा-पूरा करना चाहिए।  किसी भी मां पिता को अपनी सन्तान को विद्या से वंचित नहीं रहने देना चाहिए। विद्यारम्भ संस्कार द्वारा बालक-बालिका में उन मूल संस्कारों की स्थापना का प्रयास किया जाता है, जिनके आधार पर उसकी शिक्षा मात्र ज्ञान न रहकर जीवन निमार्ण करने वाली हितकारी विद्या के रूप में विकसित हो सके। तथा परमात्मा के प्रति उसका लगाव भी अत्यधिक हो अतः विधिवत इस संस्कार को करना चाहिए 
सर्व प्रथम पूजन के लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमा
पट्टी, दवात और लेखनी, पूजन के लिए। बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है।
गुरु पूजन के  प्रतिरूप  में नारियल रखा जा सकता है। 
बच्चे के गुरू सामने हों तो उनका पूजन भी कराया जा सकता है।
बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली देकर मन्त्र के साथ गणपति जी के मूर्ति के सामने अपिर्त कराएँ। तथा भगवान गणेश जी से बच्चे की उत्तम बुद्धि के लिय प्रार्थना करे
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति हवामहे, वसोमम। आहमजानि गभर्धमात्वमजासि गभर्धम्। ॐ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥

फिर बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली आदि देकर मन्त्र बोलकर माँ सरस्वती प्रतिमा के आगे सभी पूजन सामग्री को भक्ति भाव से निवेदित करनी चाहिए तथा विद्या की अधिष्ठात्री देवी से प्रार्थना करनी चाहिए कि यह बालक कला, ज्ञान, संवेदना की देवी माता सरस्वती के स्नेह का पात्र बन रहा है। उनकी छत्रछाया का रसास्वादन करके यह ज्ञानाजर्न में सतत रस लेता हुआ आगे बढ़ सकेगा।

ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिवार्जिनीवती। यज्ञं वष्टुधियावसुः।
ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।

‍विद्यारम्भ करते हुए पहले कलम हाथ में लेनी पड़ती है। कलम की देवी धृति है धृति का पूजन भी बड़े भाव से करना चाहिए
फिर इस मंत्र से लेखनी का पूजन करना चाहिए
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ॐ पुरुदस्मो विषुरूपऽ इन्दुः अन्तमर्हिमानमानंजधीरः। एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीम्, अष्टापदीं भावनानु प्रथन्ता स्वाहा।

कलम का उपयोग दवात के द्वारा होता है। स्याही या खड़िया के सहारे ही कलम कुछ लिख पाती है। इसलिए कलम के बाद दवात के पूजन का नम्बर आता है। दवात की अधिष्ठात्री देवी 'पुष्टि' हैं
दवात पूजन मंत्र 👇
ॐ देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीवर्योधसं, पतिमिन्द्रमवद्धर्यन्। जगत्या छन्दसेन्दि्रय शूषमिन्द्रे, वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज॥

विद्या अध्ययन में तीसरा पूजन पट्टी का है। कलम, दवात की व्यवस्था हो जाने पर उसका उपयोग पट्टी या कापी-कागज पर ही होता है, इनकी अधिष्ठात्री 'तुष्टि' है। 

ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पतनी सुकृतं बिभर्ति। अपारसेन वरुणो न साम्नेन्द्र, श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥ 

गुरु का स्थान तो शास्त्रों में भगवान से भी बड़ा है इसलिए गुरुदेव भगवान का पूजन भी विधिवत करना चाहिए
ॐ बृहस्पते अति यदयोर्ऽ, अहार्द्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जानेषु, यद्दीदयच्छवसऽ ऋतप्रजात, तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्। उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये, त्वैष ते योनिबृर्हस्पतये त्वा॥ 
ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। 

इसके पश्चात् पट्टी पर बालक के हाथ से 'ॐ भूभुर्वः स्वः' शब्द लिखाया जाए। खड़िया से उन अक्षरों को अध्यापक बना दें और बालक उस पर कलम फेरकर अक्षर बना दे 
अक्षर लेखन करा लेने के बाद उन पर अक्षत, पुष्प छुड़वाएँ। ज्ञान का उदय अन्तःकरण में होता है, पर यदि उसकी अभिव्यक्ति करना न आए, तो भी अनिष्ट हो जाता है। ज्ञान की प्रथम अभिव्यक्ति अक्षरों को पूजकर अभिव्यक्ति की महत्ता और साधना के प्रति उमंग पैदा की जाए ।

ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च, नमः शंकराय च मयस्कराय च, नमः शिवाय च शिवतराय च। 

इसके बाद अग्नि स्थापन करे और गायत्री मन्त्र की आहुति प्रदान करे
 
हवन सामग्री में कुछ मिष्टान्न मिलाकर पाँच आहुतियाँ इस मन्त्र से कराएँ। 

ॐ सरस्वती मनसा पेशलं, वसु नासत्याभ्यां वयति दशर्तं वपुः। रसं परिस्रुता न रोहितं, नग्नहुधीर्रस्तसरं न वेम स्वाहा। इदं सरस्वत्यै इदं न मम। 
विद्या आरम्भ पूजन कार्यक्रम विधिवत सम्पादित होने पर गुरु तथा आचार्य अपने शिष्य को शुभ आशीर्वाद दे

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